जीवन में सफलता के लिए क्या जरूरी है?

                    Rev. Nitin Malviya
जीवन में सफलता के लिए क्या जरूरी है :- 

जब हम परमेश्वर् के वचनों को पढ़ते है तो वचन हमको बताता है कि सफलता के लिए निम्न बाते जरूरी है जो इस प्रकार है। 

1) भजन सहिता 1:1- 3  क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्‍टों की युक्‍ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में बैठता है! 

परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है। 

वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है, और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरुष करे वह सफल होता है।


2) यहोशू 1:8   व्यवस्था की यह पुस्तक  तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए, इसी में दिन रात ध्यान दिए रहना, इसलिये कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा।

आज हम सीखेंगे बाइबल के अनुसार धन्य होना क्या है व्यवस्था क्या है और ध्यान क्या है इससे क्या तात्पर्य है और इससे हमारे जीवन में और क्या-क्या चीज जोड़ी है विस्तार पूर्वक देखेंगे आप हमारे साथ बने रहिए। 

1. बाइबल के अनुसार धन्य होना क्या है? 
2. बाइबल के अनुसार व्यवस्था क्या है ?
3. बाइबल के अनुसार ध्यान क्या है? 

1) धन्य (आशिषित) :- 

अन्य या आशीषित होने का अर्थ धन संपत्ति या रुपये पैसे का होना, औ प्रसन्न होने का तात्पर्य अच्छा महसूस करना नहीं है । 
** बाईबल में आशीषित होने व प्रसन्नता का अर्थ है की हम (परमेश्वर के दान प्राप्त करना)
और वह करना जो परमेश्वर चाहता है कि हम करे (भजन 127:13, 128:4,5, 144:12). है 

* हमारे पास ( भोजन घर अन्य वस्तुए ये दान है ये पर्मेश्वेर् की आशीष के चिन्ह है। ये दान प्रभु की ओर से है। किंतु जीवन इनसे कहीं बढ़कर है सच्चे जीवन का अर्थ परमेश्वर से जुड़े रहना सच्ची आशीष या प्रसन्नता में परमेश्वर की शिक्षा के प्रति खुला रहना और वैसा जीवन जीना जैसा परमेश्वर चाहता है (भजन संहिता 1:1,2 ) भजन संहिता 119:1, 14

* परमेश्वर उन्हे आशीष व सुरक्षा प्रदान करते हैं जिनका भरोसा उसे पर है जो उसकी ओर भागते हैं,।(भजन 2:12) 

* सच्ची आशीष यह है कि हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जिये। 
* धन्य हो तुम मनुष्य मेरे कारण तुम्हें सताए (मट्टी 5:11, भजन सहिता 9:13,13:4,17:9,109:2-5 )
प्रसन्नता वास्तव में क्या है :- (भजन 119:92 ) 

2) व्यवस्था क्या है:- 
                      
इब्रानी शब्द तोराह  का सामान्य अनुवाद व्यवस्था है। जिसका अर्थ है शिक्षा या निर्देश जिन्हे परमेश्वर ने सीने पर्वत पर दिए । (निर्ग 20:1).
 
* पाँच पुस्तके (उत्पत्ति से व्यवस्था) तक तोराह या व्यवस्था के नाम से जानी जाती है। 

*कई परिस्थिति में इसमें बदलाव भी किया गया था। 

* मत्ति 5:17 यीशु संपूर्ण व्यवस्था का सार एवं अर्थ इन शब्दो मे प्रस्तुत करते है की परमेश्वर से और पड़ोसी से प्रेम करो। 
(मती 22:37-40)

* पौलूस के अनुसार व्यवस्था उपयोगी है क्योंकि यह हमारे पाप को बताती हैं। (रोम. 3:20) (गेला. 3:19) 

* यह बतानी है कि क्या भला और क्या पवित्र है (रोम 7:12) 

*प्रसन्नता एवं सच्चा जीवन :- परमेश्वर की बाते सुनने तथा परमेश्वर के निर्देशों को मानने से मिलती है। न कि स्वयं को प्रसन्न करने से ।। 

3) बाइबल के अनुसार ध्यान क्या है:-

बाइबल के अनुसार मसीही ध्यान  हमारे मन को परमेश्वर के वचन पर केंद्रित करता है और यह उसके बारे में क्या बताता है। दाऊद ने कहा “परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है” (भजन संहिता 1: 2)। 

सच्चा मसीही ध्यान एक सक्रिय विचार प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम स्वयं को परमेश्वर की स्तुति, वचन के अध्ययन और प्रार्थना करके महिमा करने लिए देते हैं। हमें परमेश्‍वर से यह समझने की आवश्यकता है कि वह पवित्र आत्मा द्वारा हमें समझ दे, जिसने हमें “सभी सत्य” का नेतृत्व करने का वचन दिया है (यूहन्ना 16:13)। और अंत में, हमने अपने दैनिक जीवन में जो सत्य सीखा है उसे अमल में लाना है।

मसीही ध्यान आत्मा के लिए वह है जो पाचन शरीर के लिए है। यह वैयक्तिक और व्यावहारिक बनाता है, जो व्यक्तिगत और व्यावहारिक है, जो देखा, सुना या पढ़ा गया है। पौलुस ने तीमुथियुस को इन बातों पर ध्यान देने का निर्देश दिया; “उन बातों को सोचता रह, और इन्हीं में अपना ध्यान लगाए रह ताकि तेरी उन्नति सब पर प्रगट हो। अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रख” (1 तीमुथियुस 4:15)। ध्यान पूरे दिन और यहां तक ​​कि रात में भी हो सकता है “जब मैं बिछौने पर पड़ा तेरा स्मरण करूंगा, तब रात के एक एक पहर में तुझ पर ध्यान करूंगा” (भजन संहिता 63: 6)।

मध्यस्थता में सबसे पहले परमेश्वर की भलाई के लिए प्रशंसा और कृतज्ञता की भावना शामिल होनी चाहिए और उनकी दैनिक दया को याद करने में “मेरा ध्यान करना, उसको प्रिय लगे, क्योंकि मैं तो यहोवा के कारण आनन्दित रहूंगा” (भजन संहिता 104: 34।

फिर, मसीही को प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के निर्देश पर ध्यान देना चाहिए “सचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जने वाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए” (1 पतरस 5: 8)।

इसका मतलब यह नहीं है कि हमें प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लगातार झुकना चाहिए, लेकिन यह कि हमें कभी भी मन की प्रार्थना में रहना चाहिए, यहां तक ​​कि रास्ते से चलते हुए या जीवन के कर्तव्यों में लगे रहने के लिए, कभी भी हमारी याचिकाओं को जरूरत के समय में मदद के लिए स्वर्ग भेजने के लिए तैयार रहना चाहिए, “जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है” (मत्ती 26:41) “निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:17); “आशा मे आनन्दित रहो; क्लेश मे स्थिर रहो; प्रार्थना मे नित्य लगे रहो” (रोमियों 12:12)।

"जब हम इन बातो को मानते है जो परमेश्वर् करने को बोलता है तो परमेश्वर् हमसे वादा करता है कि वो हमारे सारे कामो को सफल करेगा। "

4) हम लोगो से परमेश्वर् का वादा

1) अपने कामों को यहोवा पर डाल दे, इस से तेरी कल्पनाएँ सिद्ध होंगी।  नीतिवचन 16:3

2) यहोवा जो तेरा छुड़ानेवाला और इस्राएल का पवित्र है, वह यों कहता है: “मैं ही तेरा परमेश्‍वर यहोवा हूँ जो तुझे तेरे लाभ के लिये शिक्षा देता हूँ, और जिस मार्ग से तुझे जाना है उसी मार्ग पर तुझे ले चलता हूँ।  यशायाह 48:17 
 
3) वह तेरे मन की इच्छा पूरी करे, और तेरी सारी युक्‍ति को सफल करे!   भजन संहिता 20:4 

   इस आर्टिकल को पढ़ने के लिए धन्यवाद

एक बार फिर से आप सभी को जय मसीह की अगर आप इस आर्टिकल से कुछ सीखते हैं और आपका जीवन आशीषित होता है तो अपने दोस्तों को भी शेयर करें । 
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